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    राजस्थान में मत्स्य पालन एवं पशुपालन - Fisheries and Animal Husbandry in Rajasthan

    राजस्थान में पशुपालन एवं पशुधन - Animal Husbandry in Rajasthan

    राजस्थान की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में पशुपालन व्यवसाय का विशेष महत्व है। राजस्थानवासियों के लिये पशुपालन न केवल जीविकोपार्जन का आधार है, बल्कि यह उनके लिये रोजगार और आय प्राप्ति का सुदृढ़ तथा सहज स्रोत भी है। राज्य के मरुस्थलीय और पर्वतीय क्षेत्रों में भौगोलिक और प्राकृतिक परिस्थितियों का सामना करने के लिये एकमात्र विकल्प पशुपालन व्यवसाय ही रह जाता है। राज्य में जहाँ एक ओर वर्षाभाव के कारण कृषि से जीविकोपार्जन करना कठिन होता है, वहीं दूसरी ओर औद्योगिक रोजगार के अवसर भी नगण्य हैं। ऐसी स्थिति में ग्रामीण लोगों ने पशुपालन को ही जीवन शैली के रूप में अपना रखा है। पशुपालन व्यवसाय से राज्य की अर्थव्यवस्था अनेक प्रकार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष घटकों से लाभान्वित होती है।


    पशुधन की बहुलता 

    पशुसम्पदा की दृष्टि से राजस्थान एक समृद्ध राज्य है। यहाँ भारत के कुल पशुधन का लगभग 11.5 प्रतिशत मौजूद है। क्षेत्रफल की दृष्टि से पशुओं का औसत घनत्व 120 पशु प्रति वर्ग किलोमीटर है जो सम्पूर्ण भारत के औसत घनत्व (112 पशु प्रति वर्ग किलोमीटर) से अधिक है। राज्य में 1988 में पशुओं की कुल संख्या 409 लाख थी जो बढ़कर 1992 में 492.67 लाख तथा 1996 में 568.19 लाख तक पहुँच गई। पशुओं की बढ़ती हुई संख्या अकाल और सूखे से पीड़ित राजस्थान के लिये वर्दान सिद्ध हो रही है। आज राज्य की शुद्ध घरेलू उत्पत्ति का लगभग 15 प्रतिशत भाग पशु सम्पदा से ही प्राप्त हो रहा है। सम्पूर्ण भारत के सन्दर्भ में राजस्थान का योगदान ऊन उत्पादन में 45 प्रतिशत, पशुओं की माल वाहक क्षमता में 35 प्रतिशत और दूध उत्पादन में 10 प्रतिशत है। 


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    वर्तमान समय में राज्य में पशुपालन की दृष्टि से गाय-बैल, भैंस-बकरियाँ, ऊँट, घोड़े, टट्टू एवं गधे हैं। भेड़ों तथा ऊँटों की संख्या की दृष्टि से राजस्थान का देशभर में प्रथम स्थान है। यूँ तो राज्य के लगभग सभी जिलों में न्यूनाधिक पशुपालन का कार्य किया जाता है परन्तु व्यवसाय के रूप में मुख्य रूप से मरुस्थलीय, शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में यह कार्य किया जाता है। पशुपालन से न केवल ग्रामीण लोगों को स्थायी रोजगार मिलता है, बल्कि पशुओं पर आधारित उद्योगों के विकास का मार्ग भी प्रशस्त होता है। अकाल एवं सूखे की स्थिति में पशुपालन ही एक सहारा बचता है। इस व्यवसाय से पौष्टिक आहार-घी, मक्खन, छाछ, दही आदि की प्राप्ति के साथ-साथ डेयरी, ऊन, परिवहन, चमड़ा चारा आदि उद्योगों के विकास को प्रोत्साहन मिलता है। इसके अलावा बड़े पैमाने पर मांस प्राप्ति के साथ-साथ चमड़ा और हड्डियाँ भी प्राप्त होती हैं, जिनका विदेशों से निर्यात किया जाता है।

    राजस्थान में पशुधन का प्रादेशिक वितरण और उनके मुख्य क्षेत्र

    राज्य में पशुओं की विभिन्न प्रजातियों को अलग-अलग क्षेत्रों में देखते हुए निर्धारित कर मानचित्र के आधार पर समस्त राज्य को 10 भागों में विभक्त किया गया है
    ► प्रथम भाग उत्तरी पश्चिमी (राठी) क्षेत्र- यह क्षेत्र राज्य के पश्चिमी भाग में पड़ता है जहां मात्र 25 सेमी से भी कम वर्षा होती है इस क्षेत्र में आने वाले जिले गंगानगर बीकानेर और जैसलमेर हैं वनस्पति के रूप में यहां कटीली झाड़ियां व  रेलोनुरूस हिरसूटस  और पेकी अटर्जीज्म नामक घास पाई जाती है यहा राठी गाय प्रमुख नस्ल है
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    Animal Husbandry in Rajasthan
    ► द्वितीय भाग -पश्चिमी क्षेत्र (थारपारकर ) :- यह क्षेत्र भी 25 सेमी वर्षा वाला भाग हे इस क्षेत्र में आने वाले जिलों में जैसलमेर उत्तरी बाड़मेर और पश्चिमी जोधपुर (शेरगढ़ और फलोदी तहसील) जिला आता है यह राज्य के सीमावर्ती क्षेत्र में पाई जाती है यह संपूर्ण क्षेत्र अपनी जलवायवीय. विशेषता के कारण सूखा और रेतीला है बाजरा  इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण फसल है थारपारकर नस्ल की गाय इस  क्षेत्र की प्रमुख गाय है जो देश में अधिक दूध देने के लिए मशहूर है क्षेत्र में अन्य पशुओं में जैसलमेरी ऊँट और  जैसलमेरी भेड़ भी प्रसिद्ध है लोही बकरी भी पाई जाती है नाचना का गोमठ का  ऊँट  बड़ा प्रसिद्ध है
    ► तीसरा भाग उत्तरी नहरी सिंचित  भू-भाग:- यह भाग भी राज्य के कम वर्षा और अधिक तापमान  वाले सूदुर  उत्तर में स्थित गंगानगर और हनुमानगढ़ का भाग है यहां पर हरियाणवी नस्ल की गाय नाली नस्ल की भेड़ और मुर्रा नस्ल की भैंस  प्रमुखत: पाली जाती है
    ► चतुर्थ भाग मध्यवर्ती (नागौरी )क्षेत्र:- अर्ध शुष्क आंतरिक प्रवाह वाले इस मध्यवर्ती क्षेत्र में नागौर जिला जोधपुर (शेरगढ़ और फलोदी को छोड़कर )बीकानेर जिले की कोलायत तहसील का पूर्व विभाग और नोखा तहसील का दक्षिणी पूर्वी भाग चूरु जिले की सुजानगढ़ तहसील का दक्षिणी भाग और पाली जिले की सोजत और रायपुर तहसील सम्मिलित है क्षेत्र में प्रमुखता भेड़ बकरी ऊंट गाय और बैल पाले जाते हैं नागौरी गोवंश की प्रमुख नस्ल हैं नागोरी बेल संपूर्ण देश में प्रसिद्ध हैं इस क्षेत्र में प्रमुखता भेड़ बकरी ऊंट गाय बैल पाये जाते हैं मालाणी नस्ल के घोड़े और बीकानेरी ऊँट भी मशहूर है इस क्षेत्र में अंजन और  पाला नामक घासे पाई जाती है


    ► पांचवा भाग- दक्षिणी पश्चिमी क्षेत्र (सांचौर और कांकरेज):- इस  क्षेत्र में वार्षिक वर्षा 50 सेमी और माउंट आबू में 150 से में वर्षा होती है क्षेत्र में आने वाले जिलों में सिरोही जालौर पाली जिले की खारची देसूरी पाली और बाली तहसील है और बाड़मेर जिले के उत्तरी भाग के अतिरिक्त समस्त क्षेत्र आता है  कांकरेज बैल इस  क्षेत्र के बड़े महत्वपूर्ण है क्योंकि वह बहुत ही शक्तिशाली और शरीर में काफी सुडोल होते हैं यह भारी सामान खींचने में सक्षम होते हैं
    ► छठा भाग दक्षिण और दक्षिण पूर्वी (मालवी )क्षेत्र:- इस प्रदेश में 75 सेमी तक वर्षा और मई का तापमान 32 डिग्री सेल्सियस और जनवरी में 18 डिग्री सेल्सियस होता है क्षेत्र की दृष्टि से इसमें बांसवाड़ा डूंगरपुर झालावाड और कोटा जिले आते हैं तथा डूंगरपुर जिले में अरावली श्रेणी बांसवाड़ा में छप्पन का मैदान बॉरा कोटा और झालावाड में पठारी भू -भाग पाया जाता है यह क्षेत्र मालवी नस्ल के चौपायों के कारण प्रसिद्ध है भेड़ यहा सोनाली नस्ल की मिलती है बकरियां सिरोही किस्म की भैंस मुर्रा नस्ल से थोड़ी कमजोर ऊंट भारवाही जाति के मिलते हैं
    ► सातवां भाग दक्षिणी-पूर्वी मध्यवर्ती (गिर )क्षेत्र:- इस क्षेत्र में वर्षा लगभग 75 सेमी होती है इस क्षेत्र में राजसमंद उदयपुर चित्तौड़गढ़ अजमेर भीलवाड़ा और बूंदी जिले आते हैं भैंसों की स्थानीय  नस्ल दरांतीनुमा रखती है मारवाड़ी  नस्ल की भैंड लोकप्रिय है अजमेर और नसीराबाद में गिर नस्ल के सर्वश्रेष्ठ जानवर हैं जिनमें गाय प्रमुख हैं
    ► आठवां भाग-मेवात प्रदेश:- देहली  और उत्तर प्रदेश से लगा हुआ यह प्रदेश राजस्थान के पूर्व में अलवर और भरतपुर जिलों में विस्तृत है मेवाती गाय मुर्रा भैंस अलवरी और बारबरी बकरियां इस प्रदेश की मुख्य पशु धन संपत्ति है
    ► नवा भाग-रथ प्रदेश:-  क्षेत्र में पानी की अच्छी मात्रा के कारण लोग खेती में संलग्न है क्षेत्र में अलवर भरतपुर और धौलपुर जिले आते हैं यहां मुर्रा भैंस अलवरी बकरी पाई जाती है

    ► दसवां भाग-उत्तरी पूर्वी और पूर्वी (हरियाणा) प्रदेश:- इस प्रदेश में गंगानगर (करणपुर पदमपुर अनूपगढ़ और रायसिंहनगर तहसील छोड़कर )चूरु झुंझुनू सीकर जयपुर और पूर्वी बीकानेर के विभाग आते हैं इस भूभाग में प्रसिद्ध हरियाणा नस्ल की गाय राठी थारपारकर और कांकरेज है भैंसों में मुर्रा नस्ल ,भैड़ों में चोकला नाली और मारवाड़ी नस्लें बकरियों में जमुनापारी  बड़वारी अलवरी और सिरोही है इस भूभाग में उत्तर पौष्टिक घासें अंजन मुरुत  चिम्बर और  खाबल पाई जाती है

    राजस्थान में पशुधन विकास 


    अर्थव्यवस्था में व्यवसाय की उपादेयता को देखते हुये राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर यथोचित प्रयास किये जाते रहे हैं। प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में पशुधन विकास पर किये जाने वाले व्यय की राशि उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। हालाँकि प्रथम योजनावधि में यह राज्य अपने एकीकरण की समस्याओं से जूझ रहा था और पशुधन विकास व्यय कृषि विकास के साथ ही शामिल था परन्तु द्वितीय पंचवर्षीय योजना में पशुधन विकास पर 1.25 करोड़ रुपये व्यय किये गये थे। जो सातवीं योजना में 37.6 करोड़ रुपये तथा आठवीं योजना में 87.3 करोड़ रुपये हो गये। नौवीं योजनावधि में राज्य में पशुधन विकास के लिये लगभग 109.34 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। राज्य में पशुओं की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुये उनकी चिकित्सा सुविधाओं का भी निरन्तर विस्तार किया जा रहा है। 1951 में राज्य में पशु चिकित्सालयों और स्वास्थ्य केन्द्रों की संख्या केवल 147 थी, जो 1984-85 में 1106 तथा 1993-94 में 1457 हो गई। इनके साथ-साथ 55 चल चिकित्सालय, 8 जिला पशु चिकित्सालय तथा 13 रिण्डरपेस्ट नियन्त्रण केन्द्र भी चलाये जा रहे हैं।

    विभिन्न पशुओं के नस्ल सुधार, रोग नियन्त्रण और पौष्टिक आहार उपलब्धता की दृष्टि से भी अनेक कार्यक्रम चलाये गये हैं। बकरी पालकों की सहायतार्थ स्विट्जरलैण्ड सरकार के सहयोग से जहाँ अजमेर, भीलवाड़ा और सिरोही जिलों में बकरी विकास एवं चारा उत्पादन योजना शुरू की गई है, वहीं दूसरी ओर ऊँटों में हाने वाले सर्रा रोग पर नियन्त्रण पाने के लिये अनेक सर्रा नियन्त्रण इकाईयों की स्थापना की गई है। इसी प्रकार अलवर और भरतपुर जिलों में सूअर पालन व्यवसाय को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से सूअर विकास फार्म खोला गया है। इसी प्रकार गायों की नस्ल सुधारने और उनके संरक्षण के उद्देश्य से लगभग 280 गौशालाएँ चलाई जा रही हैं। कुछ गौशालाओं को केन्द्र सरकार की ओर से आर्थिक अनुदान मिलता है और बाकी अधिकांश शालाएँ राजस्थान गौ सेवा संघ के संरक्षण तथा निर्देशन से संचालित की जा रही हैं।



    भामाशाह पशुधन बीमा योजना

    किसानों और पशुपालकों को पशुधन की अकाल मृत्यु के कारण हुए नुकसान से सुरक्षा मुहैया कराए जाने की दृष्टि से दुधारू मालवाहक और अन्य पशुओं का बीमा करने हेतु भामाशाह पशुधन बीमा योजना का शुभारंभ 23 जुलाई 2016 को किया गया भारत सरकार और राज्य सरकार के आर्थिक सहयोग से इस योजना का क्रियान्वयन वर्ष 2016-17 से प्रारंभ किया गया है यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी प्रदेश के समस्त जिलों में पशुओं का बीमा किए जाने को अधिकृत होगी योजनांतर्गत उन पशुपालकों को पशुओं का बीमा किया जाएगा जिनके पास भामाशाह कार्ड है इस योजना के तहत अनुसूचित जाति और जनजाति और बीपीएल श्रेणी के पशुपालकों को प्रीमियम राशि का 70% और अन्य पशुपालकों को 50% अनुदान दिया जाएगा प्रीमियम की शेष राशि पशुपालक द्वारा वहन की जाएगी बीमा 1 साल या 3 साल की अवधि के लिए चलाया जाएगा इसमें एपीएल श्रेणी के केंद्रीय और राज्य सहायता 25% व पशुपालक द्वारा देय राशि 50% होगी BPL एससी और ST के लिए केंद्रीय सहायता 40% राज्य सहायता 30% और पशुपालक  द्वारा देय राशि 30% होगी

    Fisheries in Rajasthan - राजस्थान में मत्स्य पालन

    मछली जलीय पर्यावरण पर आश्रित जलचर जीव है तथा जलीय पर्यावरण को संतुलित रखने में इसकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह कथन अपने में पर्याप्त बल रखता है जिस पानी में मछली नहीं हो तो निश्चित ही उस पानी की जल जैविक स्थिति सामान्य नहीं है। वैज्ञानिकों द्वारा मछली को जीवन सूचक (बायोइंडीकेटर) माना गया है। विभिन्न जलस्रोतों में चाहे तीव्र अथवा मन्द गति से प्रवाहित होने वाली नदियां हो, चाहे प्राकृतिक झीलें, तालाब अथवा मानव-निर्मित बड़े या मध्यम आकार के जलाशय, सभी के पर्यावरण का यदि सूक्ष्म अध्ययन किया जाय तो निष्कर्ष निकलता है कि पानी और मछली दोनों एक दूसरे से काफी जुड़े हुए हैं। पर्यावरण को संतुलित रखने में मछली की विशेष उपयोगिता है।

    नेशनल मिशन फॉर प्रोटीन सप्लीमेंट योजना

    इस योजना के तहत जयसमंद बांध (उदयपुर) और कडाणा बैंक वाटर (डूंगरपुर) में फिंगर लिंक का संचय किया गया है माही बजाज सागर में केज कल्चर हैतू भी योजना स्वीकृत की गई योजना के अनुसार 56 तैरते हुए केज स्थापित कर उनमें मत्स्य बीज पालन और मत्स्य पालन का कार्य किया जाएगा

    राजस्थान में मत्स्य पालन  विभाग की स्थिति

    उत्तर- राज्य में उपलब्ध जल संसाधनों में मत्स्य विकास को गति दिए जाने की दृष्टि से राज्य सरकार द्वारा एक स्वतंत्र मत्स्य विभाग की स्थापना वर्ष 1982 में की गई इससे पूर्व मत्स्य विकास कार्यक्रमों का संचालन पशुपालन विभाग के अधिन था राज्य में लगभग 15561 जिला से उपलब्ध है राज्य में उपलब्ध जल स्त्रोतों का पूर्ण भराव पर लगभग4.30लाख हेक्टेयर क्षेत्र उपलब्ध है इस जल क्षेत्र में 3 .3600000 हेक्टेयर क्षेत्र बड़े और मध्यम जलाशयों के रूप में 0.94 लाख हैक्टेयर छोटे जलाशय व तालाब के रूप में उपलब्ध हैं इसके अतिरिक्त 0.87 हेक्टेयर क्षेत्र नदियों और नहरो के रूप में उपलब्ध हैं राजस्थान में केवल अंतर्देशीय जल क्षेत्र में ही मत्स्य पालन किया जाता है यहा मुख्यतः कतला, राहु और मृगल आदी देशी प्रजाति की मछलियां और  कॉमन कार्प, सिल्वर कार्प  और  ग्रास कार्प आदी विदेशी प्रजाति की मछलियां पाली जाती है
    fishries in rajasthan
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    ► मत्स्य विभाग के उद्देश्य-
    1. पालन योग्य मत्स्य प्रजातियों के मत्स्य बीज का उत्पादन संग्रहण और संवर्धन
    2. मत्स्य उत्पादन में वृद्धि मत्स्य पालन तकनीक में प्रशिक्षण देकर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना
    3. जलाशय को मत्स्य उत्पादन के लिए पट्टे पर देकर राज्य सरकार के लिए राजस्व अर्जित करना

    Notes about Fisheries-
    ► राज्य में वर्ष 2016-17 में मत्स्य उत्पादन 42.461लाख टन  हुआ
    ► राजस्थान इस दृष्टि से देश में 17वें स्थान पर है
    ► नीली क्रांति मत्स्य उत्पादन से संबंधित है
    ► मत्स्य पालन में प्रशिक्षण हेतु मत्स्य प्रशिक्षण विद्यालय उदयपुर में कार्यरत है
    ► राजस्थान में वर्तमान में 15 मत्स्य पालक विकास अभिकरण कार्यरत है
    ► विभिन्न सर्वेक्षण और अनुसंधान कार्य हेतु मत्सय सर्वेक्षण और अनुसंधान कार्यालय उदयपुर में स्थापित है
    ► बांसवाड़ा जिले में मत्स्य पालन के इतिहास में पहली बार संवल प्रजाति की मछली को मोनोकल्चर द्वारा स्वयं की भूमि पर पौंड निर्माण कर पाला जा रहा है ,राजस्थान भर में इस तरह का कल्चर पहली बार हो रहा है
    ► राज्य का पहला  मत्स्य अभ्यारण उदयपुर के "बड़े तालाब" में बनाने की योजना है जहां पर हिमालय क्षेत्र की नदियों में पाई जाने वाली दुर्लभ महाशीर  मत्स्य प्रजातियों को संरक्षण दिया जाएगा
    ► गंबूचिया मछलियों के पालन का मुख्य उद्देश्य राजस्थान में बढ़ रहे मलेरिया के प्रभाव पर नियंत्रण करना है
    ► जल संसाधनों के आधार पर राजस्थान देश में ग्यारहवें स्थान पर है
    ► आदिवासी मछुआरों के उत्थान हेतु महत्वकांशी आजीविका मॉडल योजना राज्य के तीन  जलाशयों जयसमंद  (उदयपुर) माही बजाज सागर (बांसवाड़ा) और कडाणा बैंक वाटर( डूंगरपुर) में प्रारंभ की गई है

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