लाभ का पद - Office of Profit - Exam Prepare -->

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Mar 8, 2018

लाभ का पद - Office of Profit

लाभ का पद किसे कहा जाता है? - Office of Profit : Meaning

भारतीय संविधान में या संसद द्वारा पारित किसी अन्य विधि में “लाभ के पद” को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है, हालाँकि इसका उल्लेख हुआ है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 102 (1) (ए) के अनुसार, "कोई व्यक्ति संसद् या विधानसभा के किसी सदन का सदस्य चुने जाने के लिए अयोग्य होगा यदि वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन, किसी ऐसे पद पर आसीन है जहाँ अलग से वेतन, भत्ता या बाकी फायदे मिलते हों"।
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भारतीय संविधान में दिए गए स्पष्टीकरण के अनुसार, ‘कोई व्यक्ति केवल इस कारण भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन लाभ का पद धारण करने वाला नहीं समझा जाएगा कि वह संघ का या किसी राज्य का मंत्री है।’ साथ ही इसमें ऐसे पद भी शामिल हैं जिनको संसद या राज्य सरकार द्वारा मंत्री पद का दर्जा दिया गया है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 103 में कहा गया है कि 
(1) यदि यह प्रश्न उठता है कि संसद् के किसी सदन का कोई सदस्य अनुच्छेद 102 के खंड (1) में उल्लेखित  किसी निरर्हता (ineligibility) से ग्रस्त हो गया है या नहीं, तो यह प्रश्न राष्ट्रपति के विचार विमर्श के लिए भेजा जायेगा। और 


(2) ऐसे किसी प्रश्न पर निर्णय करने से पहले राष्ट्रपति; निर्वाचन आयोग की राय लेगा और उसकी राय के अनुसार कार्य करेगा.” अर्थात निर्वाचन आयोग की राय राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होगी।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के सेक्शन 9 (ए) और संविधान के अनुच्छेद 191 (1)(ए) के तहत भी सांसदों व विधायकों को अन्य पद ग्रहण करने से रोकने के प्रावधान है. अर्थात वह दो जगहों से वेतन एवं भत्ते प्राप्त नही कर सकता है।

लाभ का पद (office of profit) किस पद को कहा जा सकता है?

कोई पद लाभ का पद है या नही उसके लिए निम्न 4 शर्तें पूरी होनी चाहिए:
1. वह पद लाभ का कहा जाता है जिस पर नियुक्ति सरकार करती हो, साथ ही नियुक्त व्यक्ति को हटाने और उसके काम के प्रदर्शन को नियंत्रित करने का अधिकार सरकार को ही हो।
2. पद पर नियुक्त व्यक्ति को पद के साथ साथ वेतन एवं भत्ते भी मिलते हों।
3. जिस जगह यह नियुक्ति हुई है वहां सरकार की ऐसी ताकत हो जिसमें फंड रिलीज करना, जमीन का आवंटन और लाइसेंस देना इत्यादि शामिल हो।
4. अगर पद ऐसा है कि वह किसी के निर्णय को प्रभावित कर सकता है तो उसे भी लाभ का पद माना जाता है।

लाभ के पद पर रहने के कारण किन लोगों को पद छोड़ना पड़ा है?

जुलाई, 2001 में उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ के नेता शिबू सोरेन की संसद सदस्यता इस आधार पर रद्द कर दी थी; क्योंकि राज्यसभा में निर्वाचन हेतु नामांकन पत्र दाखिल करते समय वह झारखंड सरकार द्वारा गठित अंतरिम "झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद" के अध्यक्ष के रूप में लाभ के पद नियुक्त थे।

UPA-1 के समय 2006 में 'लाभ के पद' (office of profit) का विवाद खड़ा होने की वजह से सोनिया गांधी को लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर रायबरेली से दोबारा चुनाव लड़ना पड़ा था। सांसद होने के साथ-साथ सोनिया गाँधी, “राष्ट्रीय सलाहकार परिषद” के पद पर आसीन थीं।
वर्ष 2006 में ही जया बच्चन को अपने पद से हटना पड़ा था क्योंकि वे राज्यसभा सांसद होने के साथ-साथ "यूपी फिल्म विकास निगम" की अध्यक्ष भी थीं। इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि 'अगर किसी सांसद या विधायक ने 'लाभ का पद' लिया है तो उसकी सदस्यता ख़त्म होगी चाहे उसने वेतन या दूसरे भत्ते लिए हों या नहीं'।
अभी हाल ही में आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों की सदस्यता भी लाभ का पद धारण करने के कारण; राष्ट्रपति द्वारा निरस्त कर दी गयी है।

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