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    भारत का मध्यकालीन इतिहास - Medieval history of India / part-2

    भारत का मध्यकालीन इतिहास - Medieval history of India -2

    मोहम्मद साहब का मदीना जाना और हिजरी संवत का आरंभ होना

    ​अबू तालिब की मृत्यु के बाद कबीले के नए प्रधान अबू जहल ने हजरत मुहम्मद को अपने कबीले की ओर से संरक्षण देना बंद कर दिया था​ अतः हजरत मुहम्मद की स्थिति एक समाज बहिष्कृत व्यक्ति जैसी हो गई थी​​​ऐसे मैं उंहें मदीना से आमंत्रण आया और वह 622 ईसवी में मदीना चले गए​ इसे हिजरत कहा गया​ इसी दिन से अर्थात 622 इसवी से हिजरी संवत का आरंभ हुआ। इस तिथी का प्रारम्भ मुहम्मद साहब का मक्का त्यागकर मदीना जाने की स्मृति में प्रारंभ हुआ​​। मदीना में उन्होने कबीलो की व्यवस्था की, पुष्टि की ओर स्वयं अपने अधिकारों को अत्यंत सीमित रखें उनका मुख्य अधिकार न्याय विषयक अथार्थ शांति की स्थापना से संबंधित था​
        मदीने में पवित्र कुरान की रचना हुई और यहीं पर उनकी शिक्षाओं को निश्चित रुप मिला उन्होंने यह आदेश दिया कि अल्लाह एक है और मोहम्मद अल्लाह का पैगंबर है उन्होंने इश्वर की एकता पर बल दिया। अपने अनुयायियों को मोहम्मद साहब ने उन फरिश्तों के आदेश पर विश्वास करने का उपदेश दिया जो ईश्वर के संदेश लाते थे​। उन्होंने पवित्र कुरान की सम्मान और प्रलय में विश्वास का उपदेश दिया​

    पाँच कर्तव्य

    मोहम्मद साहब के अनुयायियों को पांच कर्तव्य की पूर्ति करना आवश्यक था यह कर्तव्य थे:-
    1. कलमा
    2. प्रतिदिन पांच बार नमाज पढ़ना
    3. रोजा(व्रत) रखना
    4. हज (तीर्थयात्रा )और
    5. जकात था
    Note:- मुसलमानों से 3 प्रकार के कर लिए जाते थे 1. सदका, 2. जकात और 3. उस्र थे​​ 1. सदका-​ऐच्छिक कर
    ​2. जकात-​धार्मिक कर था  जो केवल धनी मुसलमानों से उनकी आय का 1/40 अथार्थ  2.5% लिया जाता था​3. उस्र-​ उत्पन्न उपज का 1/10 भाग और यदि खेती कृत्रिम ढंग से सिंचाई द्वारा होती है तो उपज का 1/20 भाग लिया जाता था
    मोहम्मद साहब ने खुदा को केंद्र में रखकर मदीना में अपने राज्य की स्थापना की। वे प्रथम मुस्लिम शासक थेउनके शासन का आधार कुरान था कुरान के धार्मिक कानून को जवाबित भी कहा जाता है​। कुरान के अनुसार वास्तविक शासक खुदा है जबकि वास्तविक एक्ता मिल्लत( सुन्नी भ्रातृव भावना) में निहीत रहती है जब कोई व्यक्ति शरीयत का पालन नहीं करता है तो उसके विरुद्ध फतवा जारी किया जा सकता है​। मुहम्मद साहब ने धर्म विरोधियों पर विजय प्राप्त करने के लिए युद्ध और राजनीतिक गठबंधन दोनों का सहारा लेते थे। उदार और क्षमा शील नीति का भी अनुसरण करते थे​
    1. बद्रा का युद्ध - मार्च-अप्रैल 624 में
    2. उहूद का युद्ध - मार्च-625 में
    3. डिच का युद्ध - मार्च-अप्रैल 627में
    ► मोहम्मद साहब के विरोधियों के पराजयो ने  उनके प्रभुत्व में और वृद्धि की और वे कुरैश का शासक बन गए​
    ​► कठिनाइयों और परिश्रम का सामना करते हुए 63वर्ष की आयु में 632ईस्वी में उनका निधन हो गया​ मोहम्मद साहब ने अपनी मृत्यु के बाद अपना कोई उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं किया था​​

    हजरत मोहम्मद साहब का उत्तराधिकारी- खिलाफत (खलीफा)

    63 वर्ष की आयु में 632 ईस्वी में मोहम्मद साहब का निधन हो गया था और मोहम्मद साहब ने अपनी मृत्यु के बाद अपना कोई उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं किया था इस कारण मदीना के वासियों ने अपना एक शासक चुनने का निर्णय किया जिसे खलीफा कहा गया खलीफा शब्द का उपयोग मोहम्मद साहब के उत्तराधिकारी के रूप में किया जाता है
    ​► कुरान में खलीफा शब्द प्रतिनिधि के लिए प्रयुक्त होती। यहॉ खलीफा को पृथ्वी पर खुदा का प्रतिनिधि माना गया है यही उपाधि पैगंबर के उत्तराधिकारी के लिए उपयुक्त मान ली गई​
    ​► खलीफा का अधिकार एक सुव्यवस्थित शासन पर आधारित था उसे न्याय और समानता के सिद्धांतों के अनुसार शासन करने का अधिकार था यदि खलीफा अल्लाह के हुक्म को नहीं मानता है तो लोगों को उसके विरुद्ध आंदोलन करने का अधिकार था​
    ​► इस्लामिक कानून बादशाहों को राजनीतिक संस्था के रुप में स्वीकार नहीं करता और इसी कारण उत्तराधिकार के कानून को भी स्वीकार नहीं करता है​
    ► मोहम्मद साहब की मृत्यु के बाद मदीना के वासियों ने अपना एक शासक चुनने का निर्णय किया। खजराज जनजाति का साद पुत्र उबैदा  उनका भावी उम्मीदवार था।​
    ► उधर कुरैशी जनजाति के प्रतिनिधि अबूब्रक, उमर और अबू उबैदा जर्राह  खलीफा की पदवी अपने पास रखना चाहते थे अथार्थ  मोहम्मद साहब का उत्तराधिकारी बनना चाहते थे काफी वादविवाद के बाद अबूब्रक को खलीफा चुना गया​
    ► इस प्रकार मोहम्मद साहब के उत्तराधिकारी के रूप में इस्लाम के चार  प्रमुख खलीफा बने - अबूब्रक ,उमर, उस्मान व अली जिनमें पहले खलीफा अबूब्रक  थे​
    ► पहले चार खलीफाओ(अबूब्रक,उमर, उस्मान और अली )के काल में इस्लाम धर्म संसार के विभिन्न भागों में फैला​
    ► मोहम्मद साहब की मृत्यु के सो वर्षों के अंदर मुसलमानों ने दो शक्तिशाली साम्राज्य (सासानिद  और  बिजेण्टाइन) को पराजित किया​
    ► उन्होंने सिरिया ,इराक और मेसोपोटामिया पर विजय प्राप्त की मुस्लिम साम्राज्य अत्यधिक विस्तृत हो गया। अतः खलीफाओं को अपनी राजधानी मदीना से हटाकर दश्मिक  बनानी पड़ी​

    मुआविया द्वारा उमय्या के खलिफा/खिलाफत की शुरुआत

    ► मुआविया ने उमय्या के खिलाफ पद की नींव डाली मुआविया ने खलीफा को एक प्रकार की बादशाहत का रूप दिया जिससे उसका धार्मिक नेतृत्व क्षीण होने लगा​
    ► मुआविया ने यजिद को अपना उत्तराधिकारी बनाया मक्का मदीना के सभी प्रमुख व्यक्तियों  ने मजीद के प्रति राज भक्ति की शपथ ग्रहण की​
    ► लेकिन कूफा की जनता ने हुसेन (मोहम्मद साहब की पुत्री फात्म का पुत्र )को खलीफा बनाने के लिए आमंत्रित किया हुसैन व यजिद के मध्य युद्ध आश्यम्भावी हो गया​

    ​► कूफा से 25 मील दूर कर्बला के मैदान में यजिद और हुसैन के बीच युद्ध हुआ जिसमें हुसैन शहीद हुए​
    ► यजिद ने लगभग 3 वर्ष तक शासन किया। यजिद का पुत्र  मुहाविया द्वितीय क्षयग्रस्त था जिसकी 3 माह बाद मृत्यु हो गई​
    ► लोगों ने मरवान पुत्र हकम को अगला खलीफा चुना। उसी समय अब्दुल्ला के पुत्र जुबेर ने खिलाफत का दावा किया उन्होंने लगभग 9 वर्ष तक संघर्ष किया​

    उमय्या  वंश(661-750)

    ​► कुरेश दो विरोधी शाखाओं में विभाजित थे। उमय्या और उनके संवर्गी जिनके पास राजसत्ता और उच्च पदों का एकाधिकार था और उनके सगोत्र हाशमी जिन पर संभावित प्रतिद्धंदी होने के कारण अत्याचार किया जाता था।​
    ​​► उमय्या वंश में कुल 14 शासक हुए थे जिन्होंने लगभग 90 वर्ष तक शासन किया।उमय्या वंश के शासक राजनीति में विश्वास करते थे सामान्यतः उमय्या शासक  व्यक्तिगत दृष्टि से सौम्य, दयालु और उदार चित्त थे वे स्वयं प्रधानमंत्री थे उन्होंने सारी समस्याओं का व्यवहारिक समाधान ढूंढने की कोशिश की और एक प्रकार से प्राधिधर्माध्ययन  समाजकी स्थापना की ।​
    ​​► उमय्या साम्राज्य भाषा व जाति की समानता और भेदभाव रहित संस्कृति पर आधारित था। किन्तु गृह  युद्ध के बाद उनके राज्य का पतन शुरु हो गया ऐसी स्थिति में सरकार बनाने के लिए शासकों के पास केवल दो रास्ते थे​
    ​► प्रारंभिक इस्लाम के प्रजातांत्रिक रूप को स्वीकार करना या सर्वाधिक केंद्रित राज्य बनान। उन्होंने एक केंद्रीकृत राज्य स्थापित करने का मार्ग अपनाय। उमय्या युग का अभिशाप संप्रदायिक विद्रोह या व्यक्तिगत महत्वकांक्षाएं थी।  जो धार्मिक आडंबरों के वेश में थी।​
    ​► फलस्वरुप हज्जाज की भांति  उमय्या अधिकारियों के लिए यह विद्रोह कठोरतापूर्वक कुचलने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं था यही कारण था कि उमय्या सम्राट अन्य राज्यों की तुलना में अधिक निरंकुश समझे जाते थे​
    ​► आठवीं शताब्दी के मध्य में खुरासान में आंदोलन प्रारंभ हुआ इस आंदोलन का नेतृत्व मुस्लिम खुरासानी  ने किया था और हेरात  और मर्व में अब्बासी खलीफा की काली पताकाएं फहराई।​
    ​► उमय्यादों के अंतिम व्यक्ति मरवानद्वितीय की मिश्र की एक गिरजा घर में हत्या के साथ उसके वंश का अंत कर दिया गया और एक नया राजवंश का जन्म हुआ जो कि अब्बासी वंश कहलाया और इस प्रकार अब्बासी वंश की स्थापना हुई​

    ​अब्बासी वंश

    अब्बास के वंशजों ने बड़ी चतुराई के साथ ईरानीयों और शियाओं के सहयोग से उमय्या वंश का नाश कर स्वयं खलीफा का पद प्राप्त किया इस्लामिक इतिहास में अब्बासीयों का शासनकाल सभी राजवंशो में लंबा रहा है।इस वंश के 33 राजवंशों ने 500 वर्षों तक शासन किया इन में प्रथम 8 जिन्हें खलीफा कहा जा सकता है
    ​​► जो इस प्रकार हैं-
    1. अबुल अब्बास सफ्फाह (749 से 54 ईसवी तक )
    2. अबू जफर मंसूर (754 से 75 ईसवी तक)
    3. महदी (775 से 85 ईसवी तक)
    4. हादी( 785-86 )
    5. हारुन रशीद( 786 से 809)
    6. अमीन (808 से 13)
    7. मामून (808 से 830 )
    8. मोतसिम (833 से 42)
    ​► अब्बासी खलीफाओं ने बगदाद को अपनी राजधानी बनाया अब्बासी खलीफाओं के शासन काल के दो महत्वपूर्ण उपलब्धियां थी​
    1. पहली--​उच्च पदों पर अरबों का एकाधिकार समाप्त हो गया और गैर अरबों जैसे ईसाई और यहूदी और ईरानियों को प्रशासन में शामिल किया गया।
    2. दूसरी उपलब्धि--​ धर्मनिरपेक्ष संस्कृतियों की विभिन्न शाखाओं का विकास था उन्होंने दृढ़ता और चतुराई से शासन किया और एक ऐसे राज्य स्थापित करने का प्रयत्न किया जिसमें अरबों और ईरानियों के समान अधिकार हो।
    ​► हरुन के शासनकाल में राजकीय वैभव का अत्यधिक विकास हुआ। अनेक भागों से विद्वान कलाकार और कवि बगदाद आए हरून के समय में ही इमाम अबू यूसुफ ने सरकार के सिद्धांत बनाए यह सिद्धांत "किताब उल खिराज" नामक पुस्तक में संकलित है यह पुस्तक जमीन और कर के मामले में एक प्रकार की नियमावली है​
    ​► विज्ञान और ज्योतिष संबंधी संस्कृत ग्रंथों का भी अनुवाद किया गया "सिंद-हिंद" नामक एक ग्रंथ का उल्लेख मिलता है जो संभवत है ब्रह्म सिद्धांत का अनुवाद था।​

    ​► 9वीं शताब्दी के अंत में अब्बासी खलीफाओ का पतन प्रारंभ हो गया। एक के बाद दूसरा प्रांत उनके यहां से निकलता गया और अंत में बगदाद और उसका निकटवर्ती  अस्थिर प्रदेश ही शेष रह गया​
    ​► अब्बासियों के आठवे खलीफा मोतसिम के साथ उसके वंश और राष्ट्र का गौरव समाप्त हो गया​

    अजम के साधारण राजवंश

    ​► 10वीं शताब्दी में अजम के कई शक्तिशाली वंश थे।  औपचारिक रुप से वे खलीफा की सत्ता को स्वीकार करते थे किंतु वह स्वतंत्र राज्य थे इनमें से कुछ प्रमुख थे ताहिरिद, सफाविद,समानिद  और बूईद।​
    ​► इन वंशजों ने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक संस्थाएं प्रारंभ की और ऐसी सरकार बनाई जो शांति स्थापित कर सके और व्यवसाय और व्यापार को बढ़ावा दे सके​
    ​► मिश्र के राजवंशो में तुलूनिद (868- 83) और इख्शिदी(933-61) के पतन के बाद अबू  मुहम्मद  उबैदुल्लाह ने फातीमी  खिलाफत की नींव डाली। उस ने उत्तरी अफ्रीका के अधिकांश भागों पर अधिकार कर लिया और महदिया  को अपनी राजधानी बनाया​

    अन्य साधारण राजवंशो में प्रमुख राजवंश थे-

    ताहिरी वंश (820-72ई.)

    ​► इस वंश का संस्थापक मामून का सेनापति ताहिर था जो खुरासान का राज्यपाल था 3 वर्ष तक शासन करने के बाद उसकी मृत्यु हो गई उसके स्थान पर उसके पुत्र तलहा को नियुक्त किया गया तल्हा के पश्चात अब्दुल्ला, ताहिर द्वितीय और मुहम्मद, ताहिर वंश के अधिकारी नियुक्त हुए अंत मे मुहम्मद को लईस  ने सिहासन से वंचित कर दिया

    समानी वंश(874-999 ई.)

    ​► इस वंश का संस्थापक इस्माइली था जिसने 874 में  ट्रांसाक्सियाना पर अपनी सत्ता स्थापित की इस वंश का शासनकाल 999 ईस्वी तक था

    सफ्फारी वंश(861-900 ईसवी)

    ​► इस्लामी राजवंश में सफ्फारी ही एक ऐसा शासक था जो अपनी श्रमिक वर्गीय उत्पत्ति पर गर्व करते थे इस वर्ग के वंश के संस्थापक याकूब था। उसने अपना जीवन एक ठठेरे के रूप में आरंभ किया बाद में ताहिरी अधिकारी सालेह ने उसे अपना सेनापति बनाया।

    861 में याकूब ने हेरात , किरमान और फर्स पर विजय हेतु प्रस्थान किया। 871 में उसने काबुल को एक तुर्क शासक( जो बौद्ध था )के अधिकार से छीन लिया। 872 में उसने ताहिरियों से खुरासान छीना और बगदाद पर आक्रमण करने का निश्चय किया किंतु राजधानी के निकट मुअफ्फक  द्वारा पराजित हुआ।
    3 वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो गई उमर जो उसका भाई था उसका उत्तराधिकारी बना। 896 में उसने नेशापुर पर अधिकार कर लिया और ट्रांसाक्सियाना  पर विजय प्राप्त करने का निश्चय किया किंतु इस्माइली सामानी द्वारा पराजित हो कर बंदी बना लिया गया और बगदाद भेज दिया गया जहां कारागार में उसकी मृत्यु हो गई।

    जियारी वंश(928-1042 ई.)

    ► इस वंश का संस्थापक जियार था यह राजवंश मूलतः साहित्यिक प्रोत्साहन के लिए विख्यात है ​अलबरूनी ने अपनी पुस्तक क्रोनोलॉजी ऑफ एशियन नेशंस​  इस वंश के शासक काबूस को समर्पित किया है।

    बुवैदी अथवा दैलमी वंश( 932 से 1052ईसवी)​

    ► इस वंश का संस्थापक  बुवैह  था । बुवेदी  शासक शिया थे इनके संरक्षण में रूढ़िवादी शिया साहित्य का अत्यधिक विकास हु।
    ► सुल्तान महमूद गजनबी ने इस वंश के अधिकांश भागों पर कब्जा कर लिया और शेष भाग  पर सल्जुकियों का अधिकार हो गया।

    कराखानी वंश

    ► इस वंश का शासक तुर्किस्तान में जेक्सार्टीज  नदी के पूर्वी प्रदेश में था। बुगरा खॉ और ईलक खॉ  इस वंश के प्रसिद्ध शासक थे

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