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    भारत का मध्यकालीन इतिहास - Medieval history of India / part-3

    ► इस्लाम का उदय अरब के रेगिस्तान में हुआ इसके प्रथम अनुयाई अरब थे। जो एशिया में एक शक्तिशाली ताकत बनकर उभरे उन्होंने अपने इस नए धर्म के प्रचार हेतु पूरे विश्व में विजय अभियान शुरू किया​।
    ​► अरबों का विशाल साम्राज्य पश्चिम में अंध महासागर से लेकर पूर्व में सिंधु नदी के तट तक और उत्तर में कैस्पियन सागर से लेकर दक्षिण में नील नदी घाटी तक विस्तृत था​।
    ​► सिंध एक शक्तिशाली साम्राज्य था इसका विस्तार मुल्तान से लेकर नीचे की ओर समुद्र तट तक सिंधु घाटी का निचला क्षेत्र तक था​।
    ​► अरब भारत पर पहला मुस्लिम आक्रमणकारी थे। अरबों के आक्रमण से पहले सिंध पर चाच  नामक एक ब्राह्मण का अधिकार था। चाच ने कन्नौज से बड़ी संख्या में ब्राह्मणों को यहां बसाया था। उन्हें मालगुजारी से मुक्त जमीनें दान में दी जिसे कृषि का प्रसार हुआ।​
    ​► अरबों के आक्रमण के समय 712 में सिंध पर चाच  का भतीजा दाहिर राज्य कर रहा था। इसी के समय में अरबों के साथ संघर्ष हुआ जिसमें अरब विजय हुए और सिंध पर अरब राज्य स्थापित हो गया​।
    ​► इससे पूर्व  सिंध पर राय परिवार का आधिपत्य था इस वंश के 5 राजाओं ने 137 वर्षों तक शासन किया।उनकी राजधानी ऐलोर  (वर्तमान रोहडी/रोहेरा )थी​।
    ​► ह्वेंसाग की भारत यात्रा के समय( 629-45)सिंध पर शूद्र जाति के बौद्ध राजा का शासन था। इस वंश का अंतिम शासक साहसी था। जिसकी मृत्यु के बाद उसके ब्राह्मण मंत्री चाच ने उसकी विधवा लाडी से विवाह कर स्वयं गद्दी पर बैठा​।
    ​► उस के शासनकाल में राज्य की सीमा और सत्ता दोनों का विस्तार हुआ चाच  के बाद चंद्र और चंद्र के बाद उसका पुत्र दाहिर गद्दी पर बैठा था​।

    विभिन्न राजवंश

    ► सातवीं शताब्दी में कश्मीर में दुर्लभ वर्धन ने कार्कोट राजवंश (हिंदू वंश) की स्थापना की थी। इसी के शासनकाल में हैनसांग ने कश्मीर की यात्रा की थी उसके उत्तराधिकारी प्रतापदित्य  ने प्रतापपुर की नींव रखी। ललितादित्य मुक्तापीड( 724 से 760 ईसवी )और जयापीड विनयदित्य (779 से 810 ई.) इस वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली शासक थे​।
    ► ललितादित्य मुक्तापिंड ने पंजाब ,कन्नौज ,दरिस्तान और काबुल पर विजय प्राप्त की उसने अरबो को भी पराजित किया और तिब्बत पर अधिकार कर लिया। 740 ईसवी के दौरान ललितादित्य ने कश्मीर के राजा यशोवर्धन को भी पराजित किया।​
    ​► उसने कश्मीर में अनेक मंदिरों, बिहारो और भवनों का निर्माण कराया। जिसमें कश्मीर का प्रसिद्ध मार्तंड (सूर्य) मंदिर के अतिरिक्त  भूतेश के शिव मंदिर और परिहास केशव के विष्णु मंदिर प्रमुख हैं​।
    ​► नेपाल जो हर्ष के समय में मध्यवर्ती  राज्य था।   अंशु वर्मा ने यहां पर ठाकुरी वंश की स्थापना की थी असम भास्करवर्मन के अधीन था। हर्ष  के मृत्यु के बाद उसने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी​।

    ​► किंतु शिलास्तंभ ने भास्करवर्मन को पराजित कर असम पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार 300 वर्षों तक असम मलेच्छो  के अधीन रहा बंगाल में पाल वंश का राज्य था। जिसकी स्थापना 750ई. में गोपाल ने की थी।​
    ​► इस वंश का सबसे महान शासक देवपाल था। देवपाल के अंतिम समय में प्रतिहार साम्राज्य की शक्ति बढ़ने लगी थी। गुर्जर प्रतिहार नरेश मिहिरभोज( 836-85 ई.) देवपाल का विरोधी था​।
    ​► मिहिरभोज प्रतिहार वंश का सबसे शक्तिशाली राजा था। प्रतिहार साम्राज्य के विघटन के बाद उत्तर भारत में कई राजपूत राज्यों का उदय हुआ​।
    ​► जिसमें अजमेर और शाकंभरी के चौहान वंश सर्वाधिक महत्वपूर्ण थे। पृथ्वीराज चौहान ने अपने पड़ोसियों की शक्ति को बढ़ने नहीं दिया। हर्ष का समकालीन चालुक्य वंश के शासक पुलकेशिन द्वितीय था​।
    ​► चालुक्य वंश के शासक विजय आदित्य 689 से 733 ईसवी तक शासन किया उसने कांची पर विजय प्राप्त कर पल्लव राजाओं से कर प्राप्त किया। अरबों के आक्रमण के समय चालुक्य वंश के शासक विजयादित्य और पल्लवों का शासक नरसिंह वर्मन द्वितीय का शासन था​।
    ​► राजनीतिक दशा का संक्षिप्त अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि अरबों के सिंध आक्रमण के समय कोई ऐसी शक्तिशाली सत्ता नहीं थी। जो उन्हें रोक सके सभी शक्तियां आपसी संघर्ष में उलझी हुई थी। समान संकट के समय में भी उन में एकता का अभाव था​।

    अरबों का सिंध विजय

    अरबो द्वारा सिंध विजय का विस्तृत वृतांत चचनामा नामक ग्रंथ में मिलता है​। यह अरबी भाषा में लिखित ग्रंथ है। बाद में अबूबकर  कूफी ने नासिरुद्दीन  कुबाचा के समय में उस का फारसी में अनुवाद किया​।

    अरबों का सिंध अभियान​

    अरब भारत पर  पहले मुस्लिम आक्रमणकारी थे पश्चिम से भारत में प्रवेश करने के लिए 4 मार्ग थे। एक जलमार्ग और 3 स्थल मार्ग।  जलमार्ग समुद्री तट के साथ साथ था तीन स्थल मार्ग में​
    1. एक हेबर की घाटी में
    2. दूसरा बोलन की घाटी में और
    3. तीसरा मकरान के किनारे किनारे था
    ► अरबों ने भारत पर आक्रमण करने के लिए इन चारो मार्गो का उपयोग किया था। थाना, देवल, खंभात सोपारा,कोलिमल्ली और मालाबार के बंदरगाहों से अरबों के सदियों पुराने व्यापारिक संबंध थे।​
    ​► वस्तुओं से लदे जहाज इन बंदरगाह से सीरिया और मिश्र होते हुए यूरोप तक जाते थे​। किंतु 8 वीं शताब्दी में अरबों के सिंध पर हुए आक्रमण के कारण यह संबंध समाप्त हो गया​​।
    ​► मीर कासिम के आक्रमण से पूर्व खलीफा उमर के समय में 636 में मुंबई के निकट थाना की विजय के लिए​एक अभियान​- भेजा गया​। लेकिन यह अभियान असफल रहा इसी अभियान के दौरान भारत के लोग सर्वप्रथम इस्लाम के संपर्क में आए इसके बाद अनेक अरब व्यापारी भारत के मालाबार समुंद्र तट पश्चिमी तट पर आकर बस गए जिसके फलस्वरुप दोनों के मध्य आदान प्रदान की प्रक्रिया शुरु हुई​। दूसरा अभियान-​ खलीफा उस्मान के समय में 644 ईसवी में अब्दुल्ला बिन उमर के नेतृत्व में स्थल मार्ग द्वारा मकरान के पश्चिमी  सिंध  में किया गया।
    ► उमर सीस्तान की विजय कर मकरान की ओर अग्रसर हुआ और मकरान और सिन्ध के शासकों को पराजित किया। किन्तु सिन्ध की  विजय के बाद भी उसे अपने राज्य में मिलाना उपयुक्त नहीं समझा।​
    ​► खलीफा को यह बताया गया कि सिन्ध में पानी और फलों की कमी है और वहां के डाकू बहुत साहसी है।  सिन्ध कि  प्राकृतिक कठिनाइयों के कारण अरबों ने इस पर आक्रमण करने का  बहुत दिनों तक साहस नहीं किया​।
    ​► कुछ समय  पश्चात अल-हरीस ने 659 ईस्वी में अगला अभियान प्रारंभ किया लेकिन वह मारा गया।  644 ई. मे अल मुहर  ने पुन: इस कार्य को प्रारंभ किया किंतु वह भी मारा गया।​
    ​► अंत में 8 वीं शताब्दी के प्रारंभ में अरबों ने बलूचिस्तान और मकरान जीत लिया। इस प्रकार सिंध की विजय का मार्ग प्रशस्त हो गया। सिन्ध  पर आक्रमण करने का  अरबों  को एक अच्छा बहाना भी मिल गया​।

    ​अरबों द्वारा सिंध पर आक्रमण करने के कारण​

    ► 708 ईस्वी में दश्मिक के खलीफा वलीद और उसके इराकी गवर्नर हज्जाज के लिए भेट लेकर सिन्हा के राजा के यहां से एक अरब जहाज ईराक  जा रहा था। जहाज में कुछ  पित्रहीन  मुस्लिम युवती थी। सिंध के बंदरगाह देवल के पास लुटेरों ने जहाज को लूट लिया​।
    ► उस समय सिंध का राजा दाहिर था। हज्जाज ने दाहिर के पास लुटेरों को दंडित करने का संदेश भेजा लेकिन दाहिर ने यह उत्तर दिया की लुटेरे उसके अधीन नहीं है और ना ही उन पर उसका कोई नियंत्रण है।​
    ► सिंध में अनेक लुटेरी जातियां बसी  हुई थी इनमें मेड, तन्कामर, कुर्क,और संगार  की जातियां बहुत उत्पात किया  करती थी। ये  समुद्र तट पर रहते थे व्यापारी-जहाज को लूटना ही इन का मुख्य धंधा और जीविका का साधन था। इन पर दाहिर  का शासन नाम मात्र का था।​

    इस घटना के बाद हज्जाज ने सिंध पर आक्रमण करने का निश्चय किया​।
    ► 711 मैं उसने उबेदुल्लाह के नेतृत्व में एक अभियान भेजा लेकिन पराजित हुआ और मारा  गया।
    ► दूसरा अभियान समुद्री मार्ग से बुदेल के नेतृत्व में भेजा गया इसके साथ ओमन  से नौ सेना भेजी गई बुंदेल भी पराजित हुआ और मारा गया।​ तत्पश्चात मीर कासिम के नेतृत्व में अभियान भेजा गया।​​
    ►  सिन्ध पर व्यापारिक महत्ता भी आक्रमण का महत्वपूर्ण कारण थी​।​

    मीर कासिम द्वारा सिंध पर आक्रमण और देवल का पतन

    ► अरब भारत पर पहला मुस्लिम आक्रमणकारी थे अरब आक्रमण के समय सिंघ की राजधानी एलोर( वर्तमान रोहडी़ ) थी​।
    ​► सिंध पर अरब आक्रमण से पहले चाच नामक एक ब्राह्मण का अधिकार था। चाच के अधिकार से पूर्व सिंध पर राय परिवार का आधिपत्य था। राय वंश के शासक शूद्र थे राय वंश का अंतिम शासक साहसी द्वितीय था​।
    ► चाच ने साहसी द्वितीय की हत्या कर इसकी विधवा लाडी से विवाह कर स्वयं गद्दी पर बैठ गया था​।

    ► अरबों के आक्रमण के समय 712 में सिंध पर चाच का भतीजा दाहिर राज्य कर रहा था। दाहिर द्वारा लुटेरे डाकू के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करने के कारण इस घटना से हज्जाज ने सिंध पर आक्रमण करने का निर्णय किया​।
    ► हज्जाज ने  सिंध पर आक्रमण करने के लिए उबैदुल्लाह और बुदेल के नेतृत्व में दो अभियान भेजें लेकिन यह दोनों ही अभियान असफल हुए। इसके पश्चात हज्जाज ने मीर कासिम (मोहम्मद बिन कासिम )के नेतृत्व में सिंध विजय हेतु अभियान भेजा था​।

    ​मीर कासिम( मुहम्मद बिन कासिम )​

    ► उबैदुल्लाह और बुदेल के पराजित होने के बाद हज्जाज ने सिंध विजय अभियान का दायित्व मीर कासिम को सौंपा जो उसका दामाद और भतीजा दोनों ही था। (अल हज्जाज इराक का गवर्नर था और उस समय खलीफा वालिद भी था)​
    ​► इस अभियान के समय मीर कासिम की आयु मात्र 17 वर्ष थी वह वीर और कुशल सेनानायक था। मीर कासिम मकरान के रास्ते स्थल मार्ग से सिंधु पर हमला किया। उसके साथ सीरिया और इराक के 6000 चुने हुए घुड़सवारों 6000 ऊँट सवारों और 3000 भारवाही  ऊँटें थी।​
    ​► जल मार्ग से पांच बड़ी मशीने भेजी गई एक मशीन के साथ 500 आदमी थे और पाँच  मशीनें मिलकर 2500 सैनिक थे। मकरान के पास वहां का गवर्नर मोहम्मद हारुन भी अपनी सेना सहित उसके साथ हो लिया​।
    ​► मकरान से मुहम्मद बिन कासिम देवल की ओर बढ़ा मार्ग में जाटों और मेढो़ को भी अपने पक्ष में कर लिया। जाट और मेढ़ मीर कासिम से इसलिए मिले क्योंकि उनके साथ सिंध के राजा दाहिर का व्यवहार अच्छा नहीं था​
    ​► वहां के बौद्ध भी दाहिर से असंतुष्ट थे और उन्होंने आक्रमणकारियों का स्वागत किया। एक विशाल सेना के साथ 712 ई. में मीर कासिम देवल के बंदरगाह पर पहुंचा और उसे घेर लिया।​
    ​► दाहिर या तो भयभीत होकर या फिर मोर्चा की दृष्टि से सिंध के पश्चिमी प्रदेशों को छोड़कर उसके पूर्व किनारों पर युद्ध की तैयारी में लग गया। अरबों ने देवल पर अधिकार कर लिया 3 दिन तक जनसंहार होता रहा 17 वर्ष से अधिक आयु वाले  सभी पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया गया और शेष को गुलाम बना लिया गया​।

    नीरुन विजय

    देवल के अधिकार के बाद मीर कासिम ने नीरुन की ओर प्रस्थान किया। इस समय नगर पर बौद्ध भिक्षुओं और ब्राह्मणों का अधिकार था। बौद्धों ने बिना युद्ध किए ही आत्म समर्पण कर दिया।​

    सेहवान यात्रा

    नीरुन के बाद मीर कासिम सेहवान की ओर बढ़ा सेहवान पर दाहिर का चचेरा भाई बजहरा का शासन था। इसने अरबों का मुकाबला करना चाहा लेकिन नगर निवासी अधिकांश बौद्ध थे युद्ध नहीं करना चाहते थे​। बजहरा ने नगर छोड़कर बुधिया के जाटों के पास शरण ली। सेहवान के निवासियों ने नगर अरबो को सौंप दिया और जजिया देना स्वीकार कर लिया​।

    जाट आक्रमण

    ► सेहवान से कूच कर मीर कासिम ने जाटो पर आक्रमण किया क्योंकि जाटों ने बजहरा को शरण दी थी ।बजहरा ने जाटों की सहायता से मीर कासिम का मुकाबला किया लेकिन मारा गया जाटों का एक  मुखिया काक  मीर कासिम से मिल गया​।
    ​► सिंधु नदी को पार करने के लिए मीर कासिम ने नावों के पुल बनाने की आज्ञा दी।​

    रावर युद्ध

    दाहिर इस आक्रमण से आश्चर्यचकित रह गया और अपनी सेना के साथ भागकर रावर में शरण ले ली।  मीर कासिम ने दाहिर पर आक्रमण(712) किया दोनों के बीच युद्ध हुआ लेकिन दाहिर पराजित हुआ और मारा गया​।

    रानी बाई

    ► राजा दाहिर की मृत्यु के पश्चात उसकी विधवा रानी "रानी बाई" ने वीरता पूर्वक रावर दुर्ग की रक्षा की। रानी बाई के नेतृत्व में सिंध की स्त्रियों ने अपने पुरुषों के पापों का प्रायश्चित  करने का प्रयत्न किया।​
    ​► रानी बाई  वीरता पूर्वक लड़ी लेकिन सफलता नहीं मिलने पर अन्य स्त्री के साथ रानी ने जौहर कर लिया​।
    ​► दाहिर की विधवा रानी ""रानी  बाई के द्वारा किए गए जोहर का उल्लेख पहली बार भारतीय इतिहास में मिलता हैं​।

    मीर कासिम की मृत्यु

    ► 714ई.मे खलीफा वलीद की मृत्यु के बाद नया खलीफा सुलेमान बना यह हज्जाज का शत्रु था। मीर कासिम हज्जाज का भतीजा और दामाद था। इस कारण सुलेमान को मीर कासिम से भी द्वैष था। उसने मीर कासिम को वापस ईराक बुलाया और घोर यातनाएं देकर उसका वध करवा दिया​।
    ​► मीर कासिम की मृत्यु के संबंध के विषय में कई मतभेद है। चचनामा के अनुसार दाहिर की दो अविवाहित पुत्रियां थी सूर्य देवी और परमाल देवी थी जिसे मीर कासिम ने ब्राह्मणवाद के पतन के बाद अपना बंदी बना लिया था​।
    ​► खलीफा सुलेमान के पास इन दोनों को भेंट के रूप में भेजा था उन्होंने खलीफा सुलेमान से शिकायत की कि वह (मुहम्मद बिन कासिम) पहले ही उनके सतीत्व को नष्ट कर चुका है। अतः खलीफा ने क्रुद्ध होकर मीर कासिम को मार डालने की आज्ञा दी​।
    ​► चचनामा की उपयुक्त उल्लेख की सत्यता पर कुछ विद्वानों को संदेह है मीर कासिम के मृत्यु के बाद भारत में अरबों का विस्तार शिथील पड़ गया।

    पश्चिमी भारत के अन्य क्षेत्रों पर अरबों की असफलताएं

    ► मीर कासिम की मृत्यु के बाद भारत में अरबों का विस्तार लगभग शिथिल सा पड़ गया था। सुलेमान के पश्चात उमर द्वितीय खलीफा बना। (717 से 720 ईसवी तक) उस के समय में जयसिंह ने मुस्लिम धर्म स्वीकार कर लिया​।
    ► अगला खलीफा हिशाम (724 से 743 ईसवी )बना इसके समय मे जयसिह ने इस्लाम धर्म त्याग दिया​।
    ​► हिशाम के समय में जुनैद सिंध का गवर्नर नियुक्त किया गया। वह  पुन: एक बार भारत में अरब सत्ता को विकसित करने का प्रयास करने लगा उसने एक युद्ध में जय सिह को कैद कर मार डाला​।
    ​► जय सिंह के अंत के साथ ही सिंध से हिंदू के राजवंश का अंत हो गया​।
    ​► सिंध पर सत्ता स्थापित होने के बाद जुनैद ने सिंध से बाहर भी अरब सत्ता को विकसित करने का प्रयास किया जैसलमेर और जोधपुर के क्षेत्र  (मरुमाल ), मालवा में उज्जैन .गुजरात के ओखामंडल ( अल्कीराज )और दक्षिण भड़ौच (बरबास) पर धावा बोला​।
    ​► इस आक्रमण के फलस्वरुप राजस्थान के कुछ क्षेत्रों पर अरबों का अधिकार हो गया किंतु वह स्थाई नहीं रहा।
    ​► आगे बढ़ने का प्रयास करने लगा लेकिन समकालीन हिंदू शासकों ने उसके अभियान को विफल कर दिया।इन शासकों में चालुक्य शासक- पुलकेशिन(अवनिजनाश्रय) प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम, गुर्जर राजा जय भट्ट, बल्लभी  का शासक शिलादित्य पंचम, कश्मीर-कांगड़ा का शासक मुक्तापीड ललितादित्य और यशोवर्मन प्रमुख है।​
    ​► पुलकेशीराज अवनिजनाश्रय  के नौसारी अभिलेख में उसे अरबो को हराने के कारण दक्षिणपंथ के ठोस स्तंभ की उपाधि प्रदान की गई है​।
    ​► भोज के ग्वालियर प्रशस्ति में नागभट्ट प्रथम को म्लेच्छों  अथवा अरबों को परास्त करने का श्रेय दिया गया है​।
    ​► प्रतिहार राजा अरबों के सबसे बड़े शत्रु थे इसी कारण अरबों को मान्यखेत के राष्ट्रकूटों से संधि करनी पडी़​।
    ​► जुनैद के बाद तमीम सिंध का गवर्नर नियुक्त हुआ वह शिथिल और कमजोर था उस के समय में जुनैद के जीते हुए प्रदेश स्वतंत्र हो गए केवल सिंध अरबों के अधीन रह गया​।
    ​► वहां भी स्थिति सुरक्षित नहीं थी तब उन्होंने एक झील के किनारे अल हिंद की सीमा पर अल महफूज (सुरक्षित )नामक एक नगर बसाया​।
    ​► 750 ईस्वी मे दश्मिक  में एक क्रांति के फलस्वरुप  उमय्या  खलीफाओं का स्थान अब्बासी खलीफाओं ने ग्रहण कर लिय।​
    ​► अब्बासी खलीफा अल मंसूर (745 से 775 ) के समय अरबों ने पुन: सिंध में अपनी प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास किया। लेकिन सफल नहीं हो सके इसके बाद खलीफाओं का नियंत्रण दिन-प्रतिदिन कम होने लगा​।
    ​► सिंध के अधिकार सरदार स्वतंत्र हो गए नवीं शताब्दी के अंत में सिंध से खलीफा का नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो गया​।
    ​► सिंध में मंसूरा और मुलतान केवल दो छोटी रियासत ही अरबों के नियंत्रण में शेष रह गई थी​।

    सिंध विजय का प्रभाव/परिणाम

    सिंध में अरब शासन 12 वीं शताब्दी तक था भारत पर अरबों के प्रभाव को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है​।
    ► वुल्जले हेग के अनुसार ​अरबों  द्वारा सिंध विजय को भारतीय इतिहास की एक आकस्मिक कथा मात्र बताया।
    ► लेनपूल के अनुसार ​सिंध पर अरब आक्रमण भारतीय इतिहास में एक घटना और इस्लामी इतिहास में परिणाम विहीन थी। अतः सिंध विजय के राजनीतिक परिणाम अल्पकालीन रहे सांस्कृतिक दृष्टि से यह महत्वपूर्ण घटना थी।
    ► प्रसिद्ध इतिहासकार स्मिथ के अनुसार ​भारत पर अरब आक्रमण के प्रभाव को शून्य मानते है। परंतु यह पूर्णतया सत्य नहीं है। भारत पर सिंध विजय का प्रभाव बहुत सीमित रहा।
    ​► अरब इस्लाम धर्म को न तो एक राजनीतिक रूप दे सके और नहीं इसे सामाजिक, सांस्कृतिक घटक का जामा  पहना सके। हिंदुओं और बौद्धो के उच्च कोटि के नैतिक आचरण और भारतीय संस्कृति से अत्यधिक प्रभावित हुए​।
    ​► स्थानीय प्रशासन चलाने के लिए बड़े पैमाने पर ब्राह्मणों और बौद्धो को शामिल किया परिणाम स्वरुप शासक और शासित वर्ग के बीच अच्छे संबंध स्थापित हो गए। अंततः हिंदू संस्कृति ने इस नव शासक वर्ग पर विजय प्राप्त कर ली​।
    ​► आरंभ से ही बलपूर्वक धर्म परिवर्तन का कोई प्रयास नहीं किया गया। बौद्धो और हिंदुओं और अग्नि पूजको को जिम्मी का दर्जा दिया गया​।

    जिम्मी का अर्थ​

    • जिम्मी का अर्थ एक ऐसी संरक्षित जनता जो मुस्लिम शासन को स्वीकार करती है और जजिया देने पर सहमत है​।
    • सिंध विजय के बाद सर्वप्रथम जजिया कर लगाने वाला शासक मीर कासिम था​।
    • अरब शासकों ने भारतीय भाषाओं ,साहित्य दर्शन ,खगोल विज्ञान, गणित और औषधि और अन्य विषयों का अध्ययन किया और इस से अत्यधिक प्रभावित हुआ​।
    • अलबरूनी के अनुसार अरबों द्वारा प्रयुक्त संख्याओं के चिह्न,हिंदू चिन्हों के सर्व सुंदर उदाहरण है। "हिंदसा" (संख्या का अरबी नाम) का मूल स्थान भारत है​।
    • अबूमशर नामक अरब सिद्धांत ज्योतिषी ने बनारस जाकर ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन किया​।
    • खलीफा मंसूर के समय में अरब विद्वानों ने ब्रम्हा गुप्त द्वारा लिखित ग्रंथ ब्रम्हा सिद्धांत और खंड खंड वाक अपने साथ ले गए और भारतीय विद्वान जल जाफरी  की सहायता से इसका अरबी भाषा में अनुवाद किया गया​।
    • खलीफा मंसूर  के समय इन पुस्तकों को विद्वान 8 वीं सदी में बगदाद ले गए थे​।
    • पंचतंत्र का फारसी अनुवाद खुसरो प्रथम के समय में किया गया जो  नौशीर वां  के नाम से विख्यात है कलीला और दिम्ना पंचतंत्र का अरबी अनुवाद है​।
    • वैज्ञानिक ज्योतिष के प्रथम सिद्धांत भी अरबों ने भारतीयों से ग्रहण किया।मंसूर के बाद हारुन खलीफा (786 से 808 ईसवी )बना। वह विद्या प्रेमी था। उस के समय में अरबों ने पश्चिमी तुर्किस्तान पर आक्रमण किया और वहां के नौ बिहार नामक बौद्ध मंदिर के विद्वान महंत  बरामका को बगदाद ले आए​।
    • खलीफा हारून उसके गुण और ज्ञान पर मुक्त होकर उसे अपना प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया बरामका ने भारतीय हिंदू विद्वानों को बगदाद बुलाकर चिकित्सा दर्शन और ज्योतिष विद्या की संस्कृति भाषा की पुस्तको का अरबी भाषा में अनुवाद करवाया​।
    • अपने चिकित्सालय का निरीक्षण भी उन्होंने भारतीय  वैद्य  के साथ किया​।
    • कला के क्षेत्र में भी अरबों ने भारतीय कला का अनुकरण किया भारतीय गायकों की प्रवीणता और हिंदू चित्रकारों की चतुरता से अत्यधिक प्रभावित हुए​।
    • मंदिरों के मंडपो के  बुर्ज को उन्होंने मस्जिदों और मकबरों का बुर्ज बनाकर भारत की कला का अनुकरण किया​।
    • अरबों ने दिरहम नामक सिक्को को  सिंध  में प्रचलित किया अरबों ने भारतीय अंकों को अपनाया​।
    • मुहम्मद बिन कासिम ने अपनी बहूजातिय  सेना में हिंदुओं को भी नियुक्त किया​।
    • कुबाचा  मोहम्मद गौरी का एक तुर्की दास है इसे मुल्तान और सिंध का गवर्नर नियुक्त किया गया था​।
    • 871 ईस्वी मे सिंध में खलीफाओं की सत्ता लगभग समाप्त हो गई और सिंध का मुल्तान और मंसूरा नामक दो अरब राज्य में विभाजन हो गया​।
    • सिंध विजय के प्रभाव के संक्षिप्त विवरण से स्पष्ट होता है कि सिंध में अरबों के अधिकार के साथ ही जीवन विज्ञान और धर्म के अनेक क्षेत्रों में हिंदू मुस्लिम संस्कृति के पारस्परिक आदान-प्रदान प्रारंभ हुआ था​।
    ​विशेष- यह महत्वपूर्ण है कि भारत में अरबों का प्रथम आगमन मालाबार तट (केरल) में व्यापारियों के रूप में हुआ ।

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