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    Historical references to Chhattisgarh - छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक संदर्भ

    छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक संदर्भ - Historical references to Chhattisgarh

    ह्मवेनसांग, प्रसिद्ध चीनी यात्री, सन 639 ई० में भारतवर्ष जब आये तो वे छत्तीसगढ़ में भी पधारे थे। उनकी यात्रा विवरण में लिखा है कि दक्षिण-कौसल की राजधानी सिरपुर थी। ह्मवेनसांग सिरपुर में रहे थे कुछ दिन। वे अपने ग्रन्थ में लिखते हैं कि गौतम बुद्ध सिरपुर में आकर तीन महीने रहे थे। इसके बारे में बहुत ही रोचक एक कहानी प्रचलित है - "उस समय सिरपुर में विजयस नाम के वीर राजा राज्य करते थे। एक बार की बात है, श्रीवस्ती के राजा प्रसेनजित ने छत्तीसगढ़ पर आक्रमण कर दिया, मगर युद्ध में प्रसेनजित ही हारने लगे थे। जैसे ही वे हारने लगे, उन्होने गौतम बुद्ध के पास पँहुचकर उनसे विनती की कि वे दोनों राजाओं में संधि करवा दें। विजयस के पास जब संधि की वार्ता पहुँची तो उन्होंने कहा कि यह तब हो सकता है जब गौतम बुद्ध सिरपुर आयें और यहाँ आकर कुछ महीने रहें। गौतम बुद्ध इसी कारण सिरपुर में तीन महीने तक रहे थे।"
    Historical references to Chhattisgarh
    Historical references to Chhattisgarh
    बोधिसत्व नागार्जुन(बौद्ध धर्म की महायान शाखा के संस्थापक) का आश्रम सिरपुर (श्रीपुर) में ही था, नागार्जुन उस समय थे जब छत्तीसगढ़ पर सातवाहन वंश की एक शाखा का शासन था। नागार्जुन और सातवाहन राजा में गहरी दोस्ती थी। ये पहली शताब्दी की बात है। पहली शताब्दी में नागार्जुन का जन्म सुन्दराभूति नदी के पास स्थित महाबालुका ग्राम में हुआ था।


    हरि ठाकुर अपनी पुस्तक "छत्तीसगढ़ गाथा'' (रुपान्तर लेखमाला-१) में कहते हैं कि सुन्दराभूति नदी को आजकल सोन्टुर नदी कहते हैं और महाबालुका ग्राम आज बारुका कहलाता है। नागार्जुन ने अपनी ज़िन्दगी में तीस ग्रन्थ लिखे। उन्होने एक आयुर्वेदिक ग्रंथ की रचना की थी जिसका नाम है, "रस-रत्नाकर''। नागार्जुन एक महान रसायन शास्री भी थे, उनका आश्रम एक प्रसिद्ध केन्द्र था जहाँ देश-विदेश से छात्र आते थे पढ़ने के लिये। ऐसा कहते हैे कि बोधिसत्व नागार्जुन ने श्रीपर्वत पर 12 वर्षों तक तपस्या की थी। ये पर्वत स्थित हैं कोरापुट जिले में जो बस्तर के नज़दीक है। नागार्जुन बाद में नालंदा विश्वविद्यालय के कुलगुरु निर्वाचित हुए थे। श्रीपुर में और एक विद्वान रहते थे - आचार्य बुद्ध घोष। वे बौद्ध धर्म के महान विद्वान थे। श्रीपुर में एक शिलालेख मिला है जिसमें उनका नाम है। आचार्य बुद्ध घोष बाद में श्रीलंका चले गये थे। वे बहुत अच्छे कवि भी थे। उन्होंने कई ग्रन्थ लिखे।
    इतिहास के कई अध्येताओं जैसे - डॉ० हीरालाल शुक्ल, डॉ० कृष्णदेव सारस्वत, स्व. गंगाधर सामंत कहते हैं कि महाकवि कालिदास का जन्म छत्तीसगढ़ में हुआ था। अध्येताओं के अनुसार कालिदास ने ''ॠतुसंहार'' उनका पहला ग्रन्थ, भी छत्तीसगढ़ में अपने रहने के समय लिखा था।

    कवि भाष्कर पाँचवीं शताब्दी में हुए थे। उनकी रचना एक शिलालेख में सुरक्षित है। यह रचना नागरी लिपि का प्रथम उदाहरण है। उस समय देश में ब्राह्मी लिपि का चलन था।

    छत्तीसगढ़, जो दक्षिण-कौसल के नाम से जाना जाता था, यहाँ मौर्यों, सातवाहनों, वकाटकों, गुप्तों, राजर्षितुल्य कुल, शरभपुरीय वंशों, सोमवंशियों, नल वंशियों, कलचुरियों का शासन था। इस क्षेत्र का इतिहास स्वालम्बी इसीलिए नहीं है क्योंकि कुछ शासकों की राजधानियाँ कहीं और थीं।

    छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक संदर्भ - मौर्यकाल, सातवाहन काल, वकाटक वंश

    मौर्यकाल - 
    ह्मवेनसांग, प्रसिद्ध चीनी यात्री का यात्रा विवरण पढ़ने पर हम देखते हैं कि अशोक, मौर्य सम्राट, ने यहाँ बौद्ध स्तूप का निर्माण करवाया था। सरगुजा जिले में उस काल के दो अभिलेख मिले हैं जिससे यह पता चला है कि दक्षिण-कौसल (छत्तीसगढ़) में मौर्य शासन था, और शासन-काल 400 से 200 ईसा पूर्व के बीच था। ऐसा कहते हैं कि कलिंग राज्य जिसे अशोक ने जीता था और जहाँ युद्ध-क्षेत्र में अशोक में परिवर्तन आया था, वहां का कुछ भाग छत्तीसगढ़ में पड़ता था।  छत्तीसगढ़ में मौर्यकालीन अभिलेख मिले हैं। ये अभिलेख ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण हैं।

    मौर्य के बाद भारत में चार प्रमुख राजवंशों का आविर्भाव हुआ -  
    1. मगध राज्य में शुंगों का उदय
    2. कलिंग राज्य में चेदि वंश
    3. दक्षिण पथ में सातवाहन
    4. पश्चिम भाग में दूसरे देश का प्रभाव
    सातवाहन काल - 
    यह काल 200 ई० पूर्व से 60 ई० पूर्व के मध्य का है। सातवाहन वंश के राजा खुद को दक्षिण पथ का स्वामी कहते थे। वे साम्राज्यवादी थे। सातवाहन वंश के शतकर्णि (प्रथम) अपने राज्य का विस्तार करते हुए जबलपुर पहुँच गये थे। जबलपुर तक उनका राज्य था। कुछ साल पहले बिलासपुर जिले में कुछ सिक्के पाए गये हैं जो सातवाहन काल के थे। बिलासपुर जिलो में पाषाण प्रतिमाएं मिली हैं जो सातवाहन काल की हैं। बिलासपुर जिले में सक्ती के पास ॠषभतीर्थ में कुछ शिलालेख पाए गये हैं जिसमें सातवाहन काल के राजा कुमारवर दत्त का उल्लेख है । ह्मवेनसांग, प्रसिद्ध चीनी यात्री अपने यात्रा विवरण में लिखते हैं कि नागार्जुन (बोधिसत्व) वहां रहते थे।

    वकाटक वंश - 
    छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में एक ताम्रपत्र मिला था कुछ साल पहले। वह ताम्रपत्र वकाटक वंश का है। वकाटक वंश बहुत कम समय के लिये छत्तीसगढ़ में था। प्रवरसेन (प्रथम) जो वकाटक वंश के राजा थे, वे दक्षिण कौसल पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। पर इनकी मृत्यु के बाद वंश का आधिपत्य खत्म हो गया और यहां गुप्तों का अधिकार स्थापित हो गया।

    छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक संदर्भ - गुप्तवंश, राजर्षितुल्य कुल, शरभपुरीय वंश, पाण्डुवंश

    गुप्तवंश - 
    समुद्रगुप्त गुप्त वंश के बहुत ही प्रभावशाली शासक थे। समुद्रगुप्त के बारे में सभी जानते हैं कि वे राज्य विस्तार के लिए लगातार प्रयत्न करते रहे थे। वे बहुत ही वीर नरेश थे। उनका नाम सुनते ही दूसरे राज्यों के राजा भयभीत हो उठते थे। समुद्रगुप्त ने जब दक्षिण-पथ पर अभियान आरंभ किया तो दक्षिण कौसल और बस्तर में वकाटकों का आधिपत्य खत्म हो गया। समुद्रगुप्त के साथ दक्षिण कौसल के राजा महेन्द्र और व्याघ्रराज (बस्तर के राजा) की लड़ाई हुई। इस युद्ध में महेन्द्र और व्याघ्रराज एकाएक हार गये। दोनों राजाओं ने गुप्त शासकों की अधीनता मान ली और अपने अपने राज्यों पर शासन करते रहे। छत्तीसगढ़ के बानबरद नामक जगह में गुप्तकाल के सिक्के मिले हैं। ये सिक्के यह प्रमाणित करते हैं कि छत्तीसगढ़ में गुप्त काल के राजाओं का प्रभाव था।

    राजर्षितुल्य कुल - 
    छत्तीसगढ़ के आरंभ में कुछ ताम्रपत्र मिले हैं जिसमे राजर्षितुल्य वंश के शासक भीमसेन (द्वितीय) का उल्लेख है। राजर्षितुल्य नाम के राजवंश का शासन दक्षिण-कौसल में पाँचवीं सदी के आस पास था। कुछ लोगों का यह कहना है कि ये राजा महेन्द्र के वंशज थे, पर इसका कोई प्रामाणिक आधार नहीं मिलता। राजर्षितुल्य नामक इस राजवंश की वंशावली महाराज सूर से आरम्भ होती है। इस वंश के महत्वपूर्ण शासक थे दयित वर्मा, भीमसेन (प्रथम), विभीषण। छत्तीसगढ़ में इस वंश का शासन सौ वर्षों से भी अधिक समय तक चला।

    शरभपुरीय वंश - 
    इस वंश की राजधानी शरभपुर में थी। शरभपुर की उप राजधानी थी श्रीपुर। इस वंश के संस्थापक शरभ नाम के राजा थे। उनके कारण ही उस जगह का नाम शरभपुर पड़ा। इतिहास के कई अध्येता यह मानते हैं कि सम्बलपुर (जो अब उड़ीसा में है) ही शरभपुर था। कुछ लोगों का यह मानना है सिरपुर ही शरभपुर कहलाता था। निश्चित रुप से कुछ कह नहीं सकते कि शरभपुर कहां था। शरभ राजा के बाद उनका पुत्र नरेन्द्र राजा हुआ। पर नरेन्द्र के बाद जो राजा हुए, उनका नाम अभी तक नहीं जाना जा सका। इस वंश में प्रतापशाली राजा थे प्रसन्नमात्र, इस वंश के अंतिम राजा थे प्रवरराज। प्रवरराज ने अपनी राजधानी श्रीपुर में रखी थी। कुरुद में कुछ ताम्रपत्र मिले हैं जो राजा नरेन्द्र के काल के हैं। छत्तीसगढ़ में कुछ सोने के सिक्के भी मिले हैं। ये कई स्थानों में मिले हैं, जो प्रसन्नमात्र के समय के हैं। छठी सदी के अंत में शरभपुरीय राजवंश को पाण्डुवंशियों ने पराजित किया था।

    पाण्डुवंश - 
    पाण्डुवंशियों ने शरभपुरीय राजवंश को पराजित करने के बाद श्रीपुर को अपनी राजधानी बनाया। ईस्वी सन छठी सदी में दक्षिण कौसल के बहुत बड़े क्षेत्र में इन पाण्डुवंशियों का शामन था। पाण्डववंशी राजा सोमवंशी थे और वे वैष्णव धर्म को मानते थे। पाण्डुवंश के प्रथम राजा का नाम था उदयन। इस वंश में एक राजा का नाम था इन्द्रबल। मांदक में जो अभिलेख प्राप्त हुआ है, उसमें इन्द्रबल के चार पुत्रों का उल्लेख किया गया है। 

    इन्द्रबल का एक बेटा था नन्न। राजा नन्न बहुत ही वीर व पराक्रमी था। राजा नन्न ने अपने राज्य का खूब विस्तार किया था। राजा नन्न का छोटा भाई था ईशान-देव। उनके शासनकाल में पाण्डुवंशियों का राज्य दक्षिण कौसल के बहुत ही बड़े क्षेत्र पर फैल चुका था। खरोद जो बिलासपुर जिले में स्थित है, वहां एक शिलालेख मिला है जिसमें ईशान-देव का उल्लेख किया गया है। राजा नन्न का पुत्र महाशिव तीवरदेव ने वीर होने के कारण इस वंश की स्थिति को और भी मजबूत किया था। महाशिव तीवरदेव को कौसलाधिपति की उपाधि मिली थी क्योंकि उन्होंने कौसल, उत्कल व दूसरे और भी कई मण्डलों पर अपना अधिकार स्थापित किया था। 

    राजिम और बलौदा में कुछ ताम्रपत्र मिले हैं जिससे पता चलता है कि महाशिव तीवरदेव कितने पराक्रमी थे। महाशिव तीवरदेव का बेटा महान्न उनके बाद राजा हुआ। वे बहुत ही कम समय के लिये राजा बने थे। उनकी कोई सन्तान नहीं थी। इसीलिये उनके बाद उनके चाचा चन्द्रगुप्त कौसल के नरेश बने। चन्द्रगुप्त के बाद उनके बेटे हर्षगुप्त राजा बने। राजा हर्षगुप्त की पत्नी का नाम वासटा था। वासटा थीं मगध सम्राट सूर्य वर्मा की पुत्री। हर्षगुप्त की मृत्यु के बाद महारानी वासटा ने पति की स्मृति में श्रीपुर में लक्ष्मण मन्दिर का निर्माण करवाया था। 

    यह मन्दिर बहुत ही सुन्दर है। उस काल की वास्तु कला का श्रेष्ठ उदाहरण है यह मन्दिर। हर्षगुप्त के बाद उनके पुत्र ने श्रीपुर में राजा बनकर शासन किया। उनका नाम था मद्यशिव गुप्त। वे बहुत ही वीर थे। वे और एक नाम से जाने जाते थे-बालार्जुन। उन्हें बालार्जुन इस लिए कहा जाता था क्योंकि वे धनुर्विद्या में निपुण थे। ऐसा कहते हैं कि वे धनुर्विद्या में अर्जुन जैसे थे। सन् 595 ई. में सम्राट बालार्जुन श्रीपुर की गद्दी पर बैठे। साठ वर्ष तक उन्होंने छत्तीसगढ़ पर शासन किया। सन् 595 से सन् 655 तक।
    इस साठ सालों की अवधि में उन्होंने न जाने कितने निर्माण कार्य करवाये।  सम्राट बालार्जुन के राज्य का विस्तार आज के रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़ जिलों पर था। उसके बहुत सारे ताम्रलेख और शिलालेख मिले हैं जिससे उपर्युक्त बातों का पता चलता है।  बालार्जुन की माता वासटा देवी एवं पिता हर्षगुप्त वैष्णव थे। पर बालार्जुन थे शैव। उनकी राजमुद्रा पर हम देखने है कि नन्दी बना हुआ है जिसे परम महेश्वर कहा गया है।  

    सम्राट बालार्जुन ने सभी धर्मों को समान रुप से राजाश्रय दिया था। उनके शासन काल में उनके सरंक्षण में शैव, वैष्णव, जैन व बौद्ध धर्मो का समान रुप से विकास हुआ। उनके समय में बौद्ध यात्रीयों का समान रुप से आना-जाना लगा रहता था। इसी समय प्रसिद्ध चीनी यात्री हवेन सांग भी यहाँ आये थे। सिरपुर में बौद्ध विहार, प्रतिमाएँ और शिलालेख मिले हैं। उसके माध्यम से हम उस काल की धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था के बारे में जान सकते हैं।  सम्राट बालार्जुन के द्वारा कई कवियों, विद्वानों, कलाकारों को राजाश्रय दिया गया था।  छत्तीसगढ़ के इतिहास का अगर "स्वर्णयुग" ढूंढा जाये, तो हम कह सकते हैं कि सम्राट बालार्जुन का शासनकाल ही "स्वर्णयुग" कहलाने योग्य है।  बालार्जुन के उत्तराधिकारी के बारे में ऐसा कहते हैं कि वे विनीतपुर में जाकर बसे थे। उनका नाम था महाभव गुप्त। उसके पुत्र थे शिवगुप्त, और शिवगुप्त के पुत्र थे जनमेजय । जनमेजय ने त्रिकलिंगाधिपति की पदवी धारण की थी। जनमेजय के पुत्र थे महाशिव गुप्त ययाति। ययाति ने विनीतपुर का नाम ययाति नगर रखा था। ययाति के पुत्र थे महाभवगुप्त - भीमरथ। इसके बाद सोमवंशियों के बारे में पता नहीं चलता। छत्तीसगढ़ में इस वंश को चालुक्य राजा कुल के शिव द्वितीय और बाद में नल राजाओं ने आठवीं सदी में समाप्त कर दिया।

    छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक संदर्भ - नलवंशः, क्षेत्रिय राजवंश, बस्तर के नल और नाग वंश, छिंदक नागवंश (बस्तर), कवर्धा के फणि नागवंश

    नलवंशः  
    इस वंश का समय 700 ई. है। नलवंशी शासक का मुख्य केन्द्र था बस्तर। वे हुए थे वकाटकों के समय में। दक्षिण - कौसल के कुछ जगहों में नलवंश का शासन था। नल नामक राजा से नल वंश का आरम्भ हुआ। इसके बारे में हमें जानकारी मिलती है उस अभिलेख से जो राजिम में मिला है। इस वंश के राजा भवदन्त वर्मा बहुत ही पराक्रमी थे। उन्होंने बस्तर और कौसल क्षेत्र में राज्य करते वक्त अपने साम्राज्य को बढ़ाया।स्कन्द वर्मा इस वंश के और एक शक्तिशाली राजा हुए। वे बस्तर और दक्षिण कौसल में काफी समय तक शासन करते रहे थे। कुछ विद्वान ऐसा कहते हैं कि उनके राज्य को पाण्डु वंशियों ने समाप्त कर दिया था।
    क्षेत्रिय राजवंश : 
    क्षेत्रिय राजवंशों में प्रमुख थे :छत्तीसगढ़ में क्षेत्रिय राजवंशो का शासन भी कई जगहों पर मौजूद था। उसके बारे में यहाँ अलग से संक्षिप्त चर्चा निम्नलिखित है -   बस्तर के नल और नाग वंश।, कांकेर के सोमवंशी।, और कवर्धा के फणि-नाग वंशी।

    बस्तर के नल और नाग वंश : 
    कुछ साल पहले अड़ेगा, जो जिला बस्तर में स्थित है, वहाँ से कुछ स्वर्ण-मुद्राएं मिली थीं। स्वर्ण-मुद्राओं से पता चलता है कि वराह राज, जो नलवंशी राजा थे, उनका शासन बस्तर के कोटापुर क्षेत्र में था। वराहराज का शासन काल ई. स. 440 में था। उसके बाद नल राजाओं जैसे भवदन्त वर्मा, अर्थपति, भट्टाटक का सम्बन्ध बस्तर के कोटापुर से रहा। ये प्राप्त लेखों से पता चलता है। कुछ विद्वानों का कहना है कि व्याध्रराज नल-वंशी राजा थे। ऐसा कहते हैं कि व्याध्रराज के राज्य का नाम महाकान्तर था। और वह महाकान्तर आज के बस्तर का वन प्रदेश ही है। व्याध्रराज के शासन की अवधि थी सन् 350 ई.। नल वंशी राजाओं में भवदन्त वर्मा को प्रतापी राजा माना जाता है। उनके शासन काल की अवधि सन् 440 से 465 ई. मानी जाती है। अर्थपति भट्टारक, भवदन्त वर्मा के पुत्र ने महाराज की पदवी धारण कर सन् 465 से  475 ई. तक शासन किया। अर्थपति के बाद राजा बने उसके भाई स्कन्द वर्मा जिन्होंने शत्रुओं से अपने राज्य को दुबारा हासिल किया था। ऐसा कहते हैं कि स्कन्द वर्मा ने बस्तर से दक्षिण - कौसल तक के क्षेत्र पर शासन किया था। स्कन्द वर्मा के बाद राजा बने थे नन्दन राज। आज तक यह स्पष्ट नहीं हो सका कि वे किसके पुत्र थे। नलवंश में एक और राजा के बारे में पता चलता है - उनका नाम था पृथ्वी राज। वे बहुत ही ज्ञानी थे। चिकित्सा शास्र में उनकी दखलंदाज़ी थी उनके बाद राजा बने विरुपराज। उनके बारे में यह कहा जाता है कि वे बहुत ही सत्यवादी थे। उनकी तुलना राजा हरिश्चन्द्र के साथ ही जाती है। उसके बाद उनका पुत्र विलासतुंग राजा बना। विलासतुंग पाण्डुवंशीय राजा बालार्जुन के समसामयिक थे। विलासतुंग ने ही राजिम में राजीव लोचन मंदिर का निर्माण करवाया। बालार्जुन की माँ ने सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर निर्माण करवाया था। उसी मन्दिर का अनुकरण करके राजिम में राजीव लोचन मन्दिर बनवाया गया था। विलासतुंग वैष्णव था। विलास तुंग के बाद राजा बने थे भीमसेन, नरेन्द्र धवल व पृथ्वी-व्याध्र। नल वंशियों के अस्तित्व के बारे में कहते हैं कि नवीं सदी तक वे महाकान्तार और उसके आसपास के भागों में थे। दसवीं सदी की शुरुआत में कल्चुरि शासकों के आक्रमण के बाद पराजित नल वंशियों ने अपनी सत्ता खो दी। पर कुछ साल बाद बस्तर कोटापुर अंचल में हम फिर से नल वंशियों के उत्तराधिकारी को छिंदक-नागवंशिय के रुप में देखते हैं।

    छिंदक नागवंश (बस्तर) : 
    बस्तर के प्राचीन नाम के सम्बन्ध में अलग-अलग मत हैं। कई "चक्रकूट" तो कई उसेे "भ्रमरकूट" कहते हैं। नागवंशी राजा इसी "चक्रकूट" या "भ्रमरकूट" में राज्य करते थे। सोमेश्वरदेव थे छिंदक नागों में सबसे जाने-माने राजा। वे अत्यन्त मेधावी थे। धनुष चलाने में अत्यन्त निपुण थे। उन्होंने अनेक मन्दिरों का निर्माण करवाया। वे शासन करते रहे सन् 1 096 से सन् 1111 तक। उनकी मृत्यु के बाद कन्दरदेव राजा बने और शायद सन् 111 1 से सन् 11 1 2 के बीच राज्य करते रहे। उसके बाद जयसिंह देव का शासन काल आरम्भ हुआ। अनुमान है कि सन् 1122 से सन् 1147 तक उनका शासन रहा। जयसिंह देव के बाद नरसिंह देव और उसके बाद कन्दर देव। विद्वानों का यह मानना है कि इस वंश के अंतिम शासक का नाम था हरिश्चन्द्र देव। हरिश्चन्द्र को वारंगल के चालुक्य अन्नभेदव (जो काकतीय वंश के थे) ने हराया। इस काकतीय वंश का शासन सन् 1148 तक चलता रहा। इस प्रकार चक्रकूट या भ्रमरकूट में छिंदक नाग वंशियों का शासन 400 सालों तक चला। वे दसवीं सदी के आरम्भ से सन् 1313 ई. तक राज्य करते रहे। विद्वानों का यह मानना है कि बस्तर में नागवंशी शासकों का शासन अच्छा था। लोगों में उनके प्रति आदरभाव था। अनेक विद्वान उनके दरबार में थे। उस समय की शिल्पकारी भी उच्चकोटि की थी। एक

    बहुत ही महत्वपूर्ण बात यह है कि नाग वंशियों के शासन कार्य में महिलाओं का भी योगदान रहा करता था। ये महिलायें राजधराने की होती थीं। प्रशासन में प्रजा की भी सहयोगिता पूरी तरह रहती थी। पर नागयुग में सती प्रथा थी। इससे पता चलता है कि महिलाओं का जीवन कैसा था। नाग युग में संस्कृत और तेलगु दोनों भाषाओं को राजभाषाओं की मान्यता मिली थी नल राजा संस्कृत भाषा और देवनागरी लिपि का इस्तमाल करते थे। उस युग में राजा ही न्याय विभाग का प्रमुख होता था। मृत्युदण्ड राजा ही देता था और मृत्युदण्ड को क्षमा भी राजा ही करता था। नल राजा शिव और विष्णु के उपासक थे। वे ब्राह्मणों की खूब कदर करते थे। वे ब्राह्मणोंे को ज़मीन देकर अपने राज्य में बसाते थे। जब हम नाग युग के मूर्ति-शिल्प की ओर देखते हैं तो हमें यह पता चलता है कि उस समय राज्य में धार्मिक उदारता थी। मूर्ति - शिल्प में हमें उमा-महेश्वर, महिषासुर, विष्णु, हनुमान, गणेश, सरस्वती, चामुंडा, अंबिका आदि नाम की जैन प्रतिमाएं मिलती हैं। बस्तर में नल नाग राजाओं का शासन करीब एक हज़ार वर्ष तक रहा।

    कवर्धा के फणि नागवंश : 
    कवर्धा रियासत जो बिलासपुर जिले के पास स्थित है, वहाँ चौरा नाम का एक मंदिर है जिसे लोग मंडवा-महल के नाम से जानते हैं। उस मंदिर में एक शिलालेख है जो सन् 1349 ई. मेंे लिखा गया था उस शिलालेख में नाग वंश के राजाओं की वंशावली दी गयी है। नाग वंश के राजा रामचन्द्र ने यह लेख खुदवाया था। इस वंश के प्रथम राजा अहिराज कहे जाते हैं। भोरमदेव के क्षेत्र पर इस नागवंश का राजत्व 14 वीं सदी तक कायम रहा।

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